Thursday, May 7, 2009

मेरे प्रिय भक्तिदाता श्रीयमुनाजी

भक्ति की दाता,रसरुपिणि,श्याम-प्रिय्,अष्ट सिध्दि-नव निधि कूं धारण करिवे वारी,सदा श्याम संग संयोग रस को अनुभव करिवे-करायवे वारि । दर्शन पयपान् सूं स्मरण सेवा ध्यान करवे वारे के वश होय्,श्याम सूं मिलायवे वारी, लीला सामग्री सिध्द करि कें निजजन के मनोरथ कीं पूर्ण करायवे वारी । भाग्य तथा सौभाग्य कूं देवे वारी। तत् सुख भाव विचारी कें सदा प्रभु की सेवा मे तत्पर रहेवे वारी,महाप्रभु श्रीवल्लभ की स्तुति सूं प्रसन्न होयवें वारी।पुष्टिलीला के जीवन् कूं प्रभु सूं मिलायवे वारी। ऐसी मेरी परम प्रिय श्यामप्रिया श्रीयमुनाजी है ।

लेखक- आचार्यश्री विजयकुमारजी महाराजश्री{कडी-अहमदाबाद्}

मेरे प्रिय महाप्रभु श्रीवल्लभ

भक्तिमार्ग के आधिदैविक सूर्य, अग्निस्वरुप , श्रीवल्लभप्रियास्वरुप , प्राणवल्लभ , उभयस्वरुप ,श्रीप्रभुजी श्रीप्रियाजी के विरहाग्निस्वरुप्,श्री कृष्णकृष्णा स्वरुप ,सदा निकूंजन की लीला में बिराजवे वारे ,प्रभु ईच्छा सूं ही भूतल पर पधारवे वारें । लीला के जीवन कूं शरण में लेवे वारें । पुष्टिलीला को अनुभव करायवें वारे । कृष्ण सेवा की रीत-प्रीत प्रकट करवें वारे । श्रीजी कूं प्रकट करिवे वारे । श्रीयमुनाजी को महात्म्य बतायवे वारे । श्रीगिरिराजजी तथा व्रज को स्वरुप प्रकट करिवें वारे । श्रीभागवत्त को गूढ अर्थ प्रकट करिवे वारे । मायावादीन् कूं परास्त करिवे वारे,पृथ्वी कूं पावन करिवे वारे ।तीर्थन् कूं सनाथ करिवे वारे ।अनेक ग्रंथन् कूं प्रकट करिवे वारे, व्रजभक्तन् कों भाव-प्रेम बतायवें वारे । अदेयदान देवे वारे,स्मरण मात्र सूं ताप कूं हरवे वारे,सदा मेरे हृदय मे बिराजवे वारे, ऐसे मेरे प्रिय महाप्रभु श्रीवल्लभ है ।
लेखक- आचार्यश्री विजयकुमारजी महाराजश्री{कडी-अहमदाबाद्}











मेरे प्रिय श्री गोवर्धनवासी सांवरे

गिरिकंदरा में सुं प्रकट होय,भक्तन् कूं आनंद देत गिरि पर अनेक लीलाएं करत गोप-गोपी गायन के संग हिलमिल खेलत,बाललीला-किशोरलीला करत,भक्तन् दीन-हीन के मनोरथ पूरण करत फल देत श्री वल्लभ के परम लाडिले-अधर सुधा रसदान देत ।अनेक चिह्नन् कूं धारण करिवे वारे। देवदमन-नागदमन-इन्द्रदमन् तीन स्वरुप प्रकट करिवे वारे । मूल एक ही स्वरूप सूं गिरिकंदरा में ठाडे । वाम श्रीहस्त ऊंचो करि प्रियजन कूं बुलायवे वारे,दक्षिण श्रीहस्त कटि पे धरि मानों कहि रहे हैं " मेरे पास जो आओगे,तो मैं कबहुं नहिं छोडूंगो " ऐसे मधुर वचन कहिवे वारे । सारस्वत कल्प की प्रकट करिवे वारे । कमलनयन,श्री प्रियाजी तथा श्री वल्लभ के वश होयके रहिवे वारें । ऐसे मेरे परमप्रिय श्री गोवर्धनवासी सांवरे श्रीजी हैं । जिनको मैं सदा ध्यान करूं हूं ।
" तुम बिन रह्यो न जाय हो "
दूध-दही माखन-मिश्री जिनकूं प्रिय हैं । श्री वल्लभ की आज्ञा सूं पुष्टिजीवन के मनोरथ सिध्ध करवे वारे । दान-मान-रास खेल की लीलान कूं प्रकट कर सबन कूं सूख देवे वारे । ऐसे मरे लाडिले ललितमनोहर, मनमोहन,चितचोर्, मेरे प्रिय श्री गोवर्धनवासी सांवरे श्रीजी हैं । हे सांवरे तुम बिन रह्यो न जाय ।
गौधूलि वेला में गैयान् कूं चराय के,वन में सूं व्रज में आवत होंय्,गैयान के मध्य में गौरज सूं अंकित ग्वालबालन सहित ब्रजरेणु अंकित चिन्ह के दर्शन करायवें वारें । अधर पे मधुर वेणु बजाय के मन कूं मोहित करिवे वारे । कारी-कामरिया-लकुटिया,मस्तक पे मोरपीछ शोभित हैं । कोमल खुले चरणारविंद सूं गौअन् के मध्य में पधारवे वारे ।भक्तन की आर्ति कूं शांत करिवे वारे । नेत्र्-कटाक्षन् सूं बूलायवे वारे,सुंदर मुखारविंद, सुंदर, सुंदर, अति सुंदर श्री अंग में समस्त चिह्नन् कूं धारण करिवे वारे, मेरे प्रिय श्री गोवर्धनवासी सांवरे.
" तुम बिन रह्यो न जाय हो "

लेखक- आचार्यश्री विजयकुमारजी महाराजश्री{कडी-अहमदाबाद्}

Tuesday, May 5, 2009

मेरी प्रिय रासपंचाध्यायी {श्रीमदभागवत्तजी}


श्री मद भागवत्तजी और द्वादश स्कंध वामें भी दशम स्कंध पूर्वाध में २९,३०,३१,३२,३३ अध्याय ये रासपंचाध्यायी है । जामें श्री कृष्ण ने शरद ऋतु की पूर्णिमा कुं वेणुनाद करी के व्रजभक्त न कुं अपने पास बुलाय फीर स्वागत कीयो, तत्तपश्चात धर जायवें की कही और पतिव्रता तथा गृहस्थ धर्म को उपदेश कीयो, परंतु गोपीजन आत्मा के पति कुं छोड्के कैसे जाये, वो धर जायके लिये तैयार नही भये और श्री कृष्ण की ये बात सुन के शांत हो गये ओर निची द्रष्टि करी के ठाडे रहे,और अपनी अनन्यता प्रकट करी. तब प्रभु ने शरद ऋतु की पूर्णिमा कुं रास को वरदान दीयो और रासलीला को प्रारंभ भयो । अलौकीक रसदान सबन कुं दीयो तब व्रजभक्त न कुं सौभाग्य मद भयो वा समय श्री कृष्ण वहासुं अंतरध्यान होय गये, तब गोपीजन ने प्रभु की शोध की, श्रीयमुनापुलीन में, तुलसी सुं ,वन वृक्षावली न सुं सबन सुं पूछ्यो की तुमने हमारे श्यामसुंदर कुं कही देख्यो है । तब सबन नें ना कही वा समय सब गोपीजन श्री यमुनाजी के तिर पे इक्कठी भई और करूण रुदन कीयो ओर रूदन करते सु स्वर में गीत गयो वोही " गोपीगीत " है । जब गीत पूरो भयो तब सबनें के मध्य में प्रभु प्रकट होयके रासलीला करी,तब गोपीजन न कुं सर्वात्मभाव प्रकट भयो,अधरामृत पान मिल्यो एसे संयोग्-विप्रयोग को अनुभव करायके प्रभु मिले एसी यह रासपंचाध्यायी मेरी परम प्रिय है ।
लेखक- आचार्यश्री विजयकुमारजी महाराजश्री{कडी-अहमदाबाद्}